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1 टिप्पणी:

  1.       “कौन थी तुम”

    इक बार नहीं सौ बार सोचा,
    फिर भी समझ न पाया,
    इक अंजानी राज़ सी, या...
    इक अपरचित ख्वाब सी थी वो,
    जो फिर से जिंदगी लायी थी,
    जो रोज़ सपनो मे आती थी,
    और लाखों ताने वाने बुन जाती थी,
    मैं रोता था तो रोती थी
    हँसता था तो हँसती थी,
    रोज़ सवेरे जगाती थी,और...
    रोज़ रात सुलाती थी,
    फिर... आँख खुल क्यों खो जाती थी,
    क्या बस एक ख्वाहिश बन जाएगी,
    या मुद्दतों का आलम बरसाएगी ।।


    अब तुम ही बताओ...कौन हो तुम.....
    क्या सिगरेट की पहली कस का एहसास हो तुम,
    या फिर एक भूखे की रोटी की तलाश हो तुम,
    शायद कल के एग्जाम में आने वाले क्वेश्चन का ख्वाब हो तुम,
    या सिलेबस न पूरा होने पर ग़मों की बरसात हो तुम,
    पर हो सकता है पाँच महीने बाद घर आने की खुशी की बौछार हो तुम,
    या एक भबरे का कलियों की चाहत का भरमार हो तुम,
    पर शायद न झुठलाये जाने वाले सच की बिसात हो तुम,
    या रहस्यमयी राजों का अंबार हो तुम,
    क्या छूटती हुई ट्रेन की रुक जाने का एहसास हो तुम,
    या फिर इन सियासती बदलावों की पहचान हो तुम,
    कौन हो तुम...क्या हो तुम...
    पता नही.....

    दोस्त कहते है तू पागल हो गया है,चला जा,
    तुम कहती है अजीब हो गए हो,बदल जा,
    और अब तो मैं भी खुद से कहने लगा हूँ...
    तेरे प्यार में, तेरे तक़रार में, तेरे बातों के दिदार में,
    और उनके यादों के समसार में,हाँ मैं पागल हो गया हूँ,
    हाँ तेरा दीवाना हो गया हूँ ।।

    फिर भी न जाने क्यों,उन कॉलेज के मस्तीयों से,
    दोस्तों के मिठी गालियों से,अनजान हो रहा था,
    उन बनारस की गलियों से,अपनी नालंदा की यादों की कलियों से,बेजान हो रहा था
    अब तो तेरी यादों का सहारा भी मेहमान हो रहा था,
    मानो जिंदगी जैसे जिंदा श्मशान हो रहा था।।

    शायद एक ऐसा दौर आ चुका था कि...
    मैं अपनी 1 BHK वाली फ्लैट में,
    4 वक्त की महादेव की कुल्हड़ वाली चाय में,
    कुछ चंद पुरानी हिंदी के उपन्यास में,
    और तेरी ख्वाबों की याद में सिमटने लगा था,
    जैसे खुद को खोने लगा था।।

    वो रातों को दिन करना,और सुबह को शाम,तुमसे ही तो सिखा था,
    रात भर बस तेरी एक कॉल का इंतजार कर सुबह थक-हार सो जाना,तुमसे ही तो सिखा था,
    नाउम्मीदगी में मोबाईल को खुद से दूर फेक अश्क बहाना, तुमसे ही तो सिखा था,
    बेसहारगी में बेबाक हो ख़ुदी से ही उलझना,तुमसे से तो सीखा था,
    बस एक ही क़सर... तो बाकी था,
    सिख न सका तो जुदाई में यूँ तेरा मुझसे ख़फ़ा होना,
    यूँ गुस्से में बातें न करना,और यूँ न अकेले तन्हां रोना।।

    अब तो शायद तेरी यादों को सहारा लिए,
    सहर की तलाश में,ख़ुद को बदलने चला हूँ मैं,
    की कल का रवि न सही कल नया 'प्रत्युष' मिलेगा तुम्हे।।

    हमारी किस्मत थी हम मिले,
    शायद अब हमें किस्मत ही मिलाये,
    शायद किस्मत की ही यह फैसले है...जो ये फासले हैं,
    पर जिंदगी को ये बताए कौन.....की जो थी,वो अब नही है,
    शायद.... पर कैसे...पता नहीं।।

    कौन थी तुम....क्या थी,
    किससे पुछूँ....
    सब कहते .....तुझे पता है,
    पर शायद...
    मुझे नही पता...कौन थी तुम।
    पर जो भी थी.....अब भी मेरे लिए खास हो तुम।।
                                    
                                                          -रवि'प्रत्युष'नारायण

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