नया नजरिया, नयी सोच

सोमवार, अप्रैल 30

खोये पन्ने : एपिसोड 2 मुझे प्यार है!

खोये पन्ने का दूसरा भाग लेकर फिर हाज़िर हूँ, 


एपिसोड 2 मुझे प्यार है!




मैं मन ही मन मुस्काई, कसूर भी तो मेरा था| आधे घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद किसी तरह मैने पानी को बाहर निकाला| 
"कम्बख़त नीद पहले ही खुल जाती तो क्या गुनाह कर देती| पूरा कपड़ा गीला हो गया|" 

मैने नीद तो जमकर लताड़ा| खिड़की के बाहर अभी भी हल्की सी बारिश हो रही थी और वो लगातार अंदर आने के लिए दस्तक दे रहा था| मैने घड़ी पर एक नज़र दौड़ाई, रात के 2 बज रहे थे| नीद तो कब की उड़ चुकी थी और अब थोड़ी ठंड भी बढ़ गयी थी मैने आलस मे आकर गीले कपड़े उतार वही टेबल पर रख दिया और ठंड से राहत के लिए कॉफी को बनाने चली गयी| 

वापस कंबल से खुद को ढका और जैसे ही कॉफी का एक सिप लिया, खुशी और ताज़गी का एहसास हुआ| पिछले 8 सालों मे कॉफी से मेरा प्यार और गहरा हुआ है| कॉफी और किताब के सिवा है ही कौन? 8 साल से बस अपनी दुनिया|

मम्मी पापा, बहन 8 साल पहले एक रोड एक्सिडेंट मे दूर चले गये और फिर 1 साल अंदर दादा दादी| कुछ महीनो तक अंकल आंटी ने सम्हाला और जब मैं सदमे से बाहर आई तो खुद अलग रहने का फ़ैसला किया| सबने समझाया लेकिन मेरी ज़िद थी, खुद को बनाने की, पहचानने की और सच को स्वीकारने की|

कॉफी की एक एक सिप का मज़ा मैं आँखे बंद करके ले रही थी| अभी भी हवाओ का झोका अपने चेहरे पर महसूस कर रही थी| जैसे कोई साँसे चल रही हो| धीरे धीरे ये और भी गहरी होती जा रही थी| घबराहट मे मैं थोड़ा पीछे हुई, और अगले ही पल मुझे गर्दन पर गीलापन महसूस हुआ और .....

और फिर आगे क्या हुआ ?

 इंतज़ार कीजिये अगले भाग का!


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