नया नजरिया, नयी सोच

सोमवार, मार्च 5

श्री देवी का यूँ चले जाना!

sridevi
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“जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में होती है |”
“दुनिया एक रंग मंच है, हम एस रंग मंच के कठपुतली है”
“तुम क्या लेकर आये थे, क्या लेकर जाओगे?”
इस तरह के डायलोग हमने बहुत देखे और सुने है | कलाकार अपनी कला से फिल्मों में हमे हँसाता है, हमें रुलाता है हाँ कभी कभी कुछ सन्देश दे जाता है | लेकिन उनकी असल जिंदगी से हमें कोई सरोकार नहीं होता है |
बीते दिनों में मीडिया और टेक्नोलॉजी ने उनकी व्यक्तिगत जिंदगी को भी तार तार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है| चाहे वो किसी अभिनेत्री को हुआ जुकाम हो या फिर चाय पर दोस्तों के संग बैठे हों|
हद तो तब हो गयी जब बेहतरीन कलाकारों में शुमार “श्री देवी” की मौत के बाद मीडिया द्वारा तमाम तरह के दलीलें देना| हो ना हो मीडिया ने उनकी दिवंगत आत्मा को भी झकझोर दिया होगा | आश्चर्य होता है, कि टीआरपी की रेस में तमाम मीडिया मानवता का खून कर रही है| इस कृत्य से ना केवल शोकाकुल परिवार आहत हुआ बल्कि हर वो शख्स जो “श्री देवी” को चाहता था, अपने आंसू पोछते हुए मीडिया की बेहूदगी पर गुस्सा जाहिर कर रहा था | अंततः बोनी कपूर को एक ख़त लिखना ही पड़ा|





हालाँकि उन्होंने खुले शब्दों में मीडिया को कुछ नहीं कहाँ क्योकि जब कोई बेशर्म हो जाये तो अपनी इज्जत खुद ही बचा लेनी चाहिए लेकिन एक इशारा जरुर किया |
“श्री देवी” बेशक बहुत ही खास थी, मैंने बचपन से उनकी बहुत सारी फ़िल्में देखी हैं, “नागिन”, “जुदाई”, "मि इंडिया", "रूप की रानी चोरों का राजा" और भी बहुत फ़िल्में मुझे अच्छी लगी| लेकिन उनकी मौत कुछ सवाल भी छोड़ गयी


क्या मीडिया यूँ ही किसी की इज्जत तार तार करता रहेगा?क्या पद्म श्री विजेताओ को गौरवमयी सम्मान (तिरंगा) देना उचित है ?क्या राज्य सरकार किसी को भी राजकीय सम्मान दे सकती है?



हम सभी श्रीदेवी को बेंतेहा प्यार करते थे लेकिन तिरंगा में लिपटे देख दुःख हुआ | उन हजारों सैनिको की तरफ से बस एक दरख्वास्त है, कम से कम तिरंगे को राजनीती के लिए इस्तेमाल मत कीजिये |
श्री देवी एक बेहतरीन अदाकारा थी लेकिन उनकी अदाकारी उनका पेशा था |
इस पोस्ट से किसी की भावना आहत हुयी हो तो माफ़ी चाहता हूँ, श्रीदेवी के परिवार के प्रति मेरी पूरी संवेदनाएं है |
जय हिंद

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