नया नजरिया, नयी सोच

सोमवार, फ़रवरी 19

मुलाकात दूसरा भाग "इन्तेहा हो गयी इंतजार की"

"इन्तेहा हो गयी इंतजार की"


वाह! आज अरसे बाद दीदार हुआ | मैंने सूर्यदेव को नमन किया। वाकई सुबह ए बनारस की बात ही निराली है! प्रकृति का सौन्दर्य इतना मनोहर की इन्सान मंत्रमुग्ध हो जाये बशर्ते उनका मन एकाग्र हो| लेकिन मेरा मन तो कही और ही था, हाँ वही चश्मे वाली कन्या के पास | इस इन्टरनेट की भागती दुनिया में भी मै उसे 72 घंटे में नहीं ढूंढ पाया था | फिर अचानक से मेरे दिमाग में मंदिर जाने की बात आयी, हाँ वहीं जहाँ से सब छूट गया था | मैं फटाफट तैयार  हुआ और जैसे ही घर के बाहर पहुचा तो पीछे  से आवाज़ आयी ‘देख आज के दिन पिट के मत आना!’ माँ की आवाज आयी | ये माँ की चेतावनी थी, वो याद दिला रही थी की वैलेंटाइन डे है |

amit pandey

‘लो भाई हो गया अब तो...’ मैंने मन ही मन कहा।

'मंदिर जा रहा हूं' मैंने जवाब दिया। अप्रत्याशित जवाब होगा किसी भी मां के लिए। शायद वो ना सोच ले की कहीं शादी तो नहीं करके आएगा। खैर मै निकल पड़ा, प्रेम के महापर्व पर शहर बनारस की खाक छानने | आज तो शहर आशिकी से पटा था।

"कौन कहता है यहां नफरत ए आम है
इधर देखो इश्क़ की बयार है हर तरफ।"

सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक घाट, मंदिर और गलियों की धूल फ़ाकने के बाद भी नतीजा सिफर रहा।

 "ये इंतजार का सफर बड़ा बेचैन करता है,
तड़पन में कभी आंखे जार जार करता है।"

मै थका हारा और बेचारा अब बेकारा हो चुका था। एक सप्ताह बीत चुका था, मै अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया था लेकिन  "उस" ओर एक चक्कर जरूर लगाता था। रातें करवटों में या फिर चांद से बतियाने में या यूं कहें कि उलाहना देने में गुजर जाता था। एक दिन सोशल मीडिया पर टाइम पास करते करते मेरा ध्यान चेक इन के विकल्प पर गया, तमाम लोग अपनी लोकेशन शेयर किए थे, मैंने भी उस दिन की चेक इन हिस्ट्री चेक करना शुरू कर दिया। मेरा चेहरा चमक रहा था, खुशी के मारे या फिर एक बार फिर  उसे देख पाने की आस में! ये नहीं पता था। पूरा चेक इन देखने के बाद भी वो कहीं नहीं मिली। मै उदास हो गया था|

 ये वाकई चौंका देने वाला था कि लड़कियां हर छोटी छोटी चीज़े भी साझा करती है, इस लड़की का कोई जिक्र ही नहीं था। मै बेमन से तस्वीरें देख रहा था, की मेरी नजर एक तस्वीर पर थम गयी।

 नौका विहार की बहुत ही सुन्दर फोटो, सूर्यास्त के समय की। मैंने उत्सुकतावश उसकी प्रोफ़ाइल खोली। 'अन्तिमा शर्मा' मुझे अनंत मिल चुका था, "प्रथम" के जीवन की अनुभूति । मेरे आंखों से मेरा प्रेम उछल रहा था, आज नयन नीर अनजाने में ही अविरल प्रवाह से बह रहे थे।

'अंतिमा' मैंने हजारों बार  नाम दोहराया होगा, उसकी चंद तस्वीरें जो अब भी मेरे सामने थी मुझे अलौकिक सुख दे रही थी।

उसकी प्रोफ़ाइल से ही पता चला कि आज वो घाट पर जा रही है।  मेरे लिए ये मौका था एक बार फिर  देखने का और बिना समय गवाएं और बिना सोचे मै पहुंच गया।

एक घंटे का इंतज़ार, जैसे सदियाँ लग गयी हो लेकिन जब  'अन्तिमा' की झलक मिली, तो जन्नत का एहसास हुआ |  वहीं मासूमियत काली बिंदी, कैट आई चश्मा, पिंक लिपस्टिक और एक बार फिर से प्यार हो गया था और हां मैंने गौर किया था की सफेद टीशर्ट और ब्लू जीन्स में थी। कुछ पल बाद ही ऐसा लग रहा था कि वो मेरे करीब आ रही थी, बिल्कुल करीब और कुछ देर बाद मेरे सामने, ठीक सामने । आई टू आई... कहीं ये सपना तो नहीं? मैंने अपना चश्मा उतारा | वो बिलकुल सामने ही थी | मैं  मंत्रमुग्ध हो उसे ही देख रहा था | उसके होंठ चल रहे थे शायद कुछ कह रही थी लेकिन मैं तो उसी में खोया, सब कुछ भूल चूका था |

  नाम तो पता चल गया होगा, और इनकी फेस टू फेस मुलाक़ात भी हो गई। तो आगे क्या होगा? क्या आगे भी बात बढ़ेगी? सब कुछ पता चलेगा थोड़ा सब्र रखिए और हां पसंद आए तो कॉमेंट करे और बहुत ज्यादा पसंद आए तो शेयर भी कर दें|
मिलते है फिर...

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