नया नजरिया, नयी सोच

शुक्रवार, नवंबर 3

'अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है!' वामिक जौनपुरी

सिराज-ए-हिंद सदियों से प्रतिभा की खान रही है, इस कड़ी में आज पेश करता हूँ वामिक जौनपुरी साहेब का लिखा ये नज्म!
Wamiq Jaunpuri  shayar ki najm


अभी तो हौसला-ए-कारोबार बाक़ी है
ये कम कि आमद-ए-फ़स्ल-ए-बहार बाक़ी है
अभी तो शहर के खंडरों में झाँकना है मुझे
ये देखना भी तो है कोई यार बाक़ी है
अभी तो काँटों भरे दश्त की करो बातें
अभी तो जैब गरेबाँ में तार बाक़ी है
अभी तो काटना है तेशों से चट्टानों को
अभी तो मरहला-ए-कोहसार बाक़ी है
अभी तो झेलना है संगलाख़ चश्मों को
अभी तो सिलसिला-ए-आबशार बाक़ी है
अभी तो ढूँडनी हैं राह में कमीं-गाहें
अभी तो मारका-ए-गीर-ओ-दार बाक़ी है
अभी साया-ए-दीवार की तलाश करो
अभी तो शिद्दत-ए-निस्फ़ुन-नहार बाक़ी है
अभी तो लेना है हम को हिसाब-ए-शहर-ए-क़िताल
अभी तो ख़ून-ए-गुलू का शुमार बाक़ी है
अभी यहाँ तो शफ़क़-गूँ कोई उफ़ुक़ ही नहीं
अभी तसादुम-ए-लैल-ओ-नहार बाक़ी है
ये हम को छोड़ के तन्हा कहाँ चले 'वामिक़'
अभी तो मंज़िल-ए-मेराज-ए-दार बाक़ी है
Wamiq Jaunpuri  shayar kajgaon

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें