Yuva Sahitya

नया नजरिया, नयी सोच

बुधवार, मई 9

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#HumTum कहानी: खो गए!

#HumTum में पहली कहानी है "खो गए!"

"सुनिए! आप वही हैं ना? फेसबुक पर हैशटैग से पोस्ट करने वाले?" उसने उतावलेपन से पूछा।
"जी, नहीं!" मैंने रूखेपन से जवाब दिया और टेबल पर पड़ी बोतलों, प्लेट्स को उठाकर डस्टबिन में फेंक दिया।
कुछ ही देर बाद, उसने मेरी तरफ इशारा करके मोबाइल में दोस्तों को कुछ दिखाया। उन्होंने हां में सर हिलाया और मुझे घूरने लगे। मैंने काउंटर से ऑर्डर रिसिप्ट उठाई और वापस किचेन में चला गया।

ये दुनिया भी कितनी छोटी है ना! कि 1000 मील दूर से भी कोई आपको अचानक से मिल जाए पता नहीं!
"वीना" को मेरी कविताएं बहुत पसंद थी, धीरे धीरे हम करीब आते गए, फिर फोन पर हमारी घंटों बातें होने लगी। 3 साल पहले मिलने के भी प्लांस बने, लेकिन अचानक से आए भूकंप में मेरा परिवार बिखर गया। परिवार में सिर्फ मै बदनसीब ही जिंदा था।

अपना शहर छोड़ मै यहां आ गया था और रेस्टोरेंट में काम करने लगा।  जब एक दिन मैसेज चेक किया तो "वीना" का आखिरी मेसेज था, "धोखेबाज हो तुम" और फिर कभी वापस फेसबुक नहीं खोला।
हां आखिरी बार उसकी कुछ तस्वीरें सेव कर ली थी, जिसे हर रात निहार लेता हूं और कुछ पंक्तियां सुना दिया करता हूं।

"स्वर! टेबल 5 का ऑर्डर हो गया" मैनेजर ने आवाज़ दी और मै सर झुकाए ऑर्डर उनके टेबल पर रख आया।
सब ख़ामोश थे, मैंने कनखियों से "वीना" की तरफ देखा वो भी मुझे ही देख रही थी, उसके आंखो में तैरते आंसू सवालों से भरे थे।

मै मुड़ा और वापिस किचेन में चला गया, उन्हीं सवालों के साथ जिसका जवाब सिर्फ अतीत के पास है।

#हमतुम
#humtum

सोमवार, अप्रैल 30

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खोये पन्ने का दूसरा भाग लेकर फिर हाज़िर हूँ, 


एपिसोड 2 मुझे प्यार है!




मैं मन ही मन मुस्काई, कसूर भी तो मेरा था| आधे घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद किसी तरह मैने पानी को बाहर निकाला| 
"कम्बख़त नीद पहले ही खुल जाती तो क्या गुनाह कर देती| पूरा कपड़ा गीला हो गया|" 

मैने नीद तो जमकर लताड़ा| खिड़की के बाहर अभी भी हल्की सी बारिश हो रही थी और वो लगातार अंदर आने के लिए दस्तक दे रहा था| मैने घड़ी पर एक नज़र दौड़ाई, रात के 2 बज रहे थे| नीद तो कब की उड़ चुकी थी और अब थोड़ी ठंड भी बढ़ गयी थी मैने आलस मे आकर गीले कपड़े उतार वही टेबल पर रख दिया और ठंड से राहत के लिए कॉफी को बनाने चली गयी| 

वापस कंबल से खुद को ढका और जैसे ही कॉफी का एक सिप लिया, खुशी और ताज़गी का एहसास हुआ| पिछले 8 सालों मे कॉफी से मेरा प्यार और गहरा हुआ है| कॉफी और किताब के सिवा है ही कौन? 8 साल से बस अपनी दुनिया|

मम्मी पापा, बहन 8 साल पहले एक रोड एक्सिडेंट मे दूर चले गये और फिर 1 साल अंदर दादा दादी| कुछ महीनो तक अंकल आंटी ने सम्हाला और जब मैं सदमे से बाहर आई तो खुद अलग रहने का फ़ैसला किया| सबने समझाया लेकिन मेरी ज़िद थी, खुद को बनाने की, पहचानने की और सच को स्वीकारने की|

कॉफी की एक एक सिप का मज़ा मैं आँखे बंद करके ले रही थी| अभी भी हवाओ का झोका अपने चेहरे पर महसूस कर रही थी| जैसे कोई साँसे चल रही हो| धीरे धीरे ये और भी गहरी होती जा रही थी| घबराहट मे मैं थोड़ा पीछे हुई, और अगले ही पल मुझे गर्दन पर गीलापन महसूस हुआ और .....

और फिर आगे क्या हुआ ?

 इंतज़ार कीजिये अगले भाग का!


सोमवार, मार्च 12

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खोये पन्ने 


हेल्लो! मै हाज़िर हूँ एक और कहानी के साथ लेकिन इस बार कहानी की मुख्य पात्र एक लड़की है, स्वछन्द और हँसमुख! आशा करूँगा आपको कहानी पसंद आयेगी-

amit ki kahani khoye panne

'ये शाम फिर ना आयेगी...' मेरा पसंदीदा गाना, मेरे पसंदीदा रेडियो चैनल पर चल रहा था और मैं  अपनी दुनिया मे अपने साथी के साथ खोई हुई थी| मैं अपने साथी के साथ सब कुछ भूल जाती हूँ, पलकें झपकाना भी|अनानास ही मुस्कुराना, कुछ पल के लिए उसके साथ ही उदास हो जाना, और फिर कभी हॅसना| एक अनोखा बंधन है, उसकी खुशी मे अपनी मुस्कुराहट पा लेती हूँ और गम के साथ थोड़ा रो लेती हूँ| 
पन्नो मे छुपी होती है मेरी खुशियाँ, ग़म और हमसफर 'किताबें'|

     जी हाँ किताबें जिन्हे बे-इंतेहा मोहब्बत करती हूँ| या यूँ कहिए की मेरा सच्चा प्यार तो किताबों से ही है| शायद इसलिए आज तक किसी और को दिल मे जगह नही दे पाई और ना ही ज़िंदगी मे|

 एपिसोड 1


"मेरे हमदम के साथ वो हसीन रात"

अक्तूबर का समय था, आमतौर पर मसूरी हमेशा ठंडा ही रहता है लेकिन उस दिन कुछ अजीब सा था हवाओ में| खाना खाकर, करीब 11 बजे आम दिनो की तरह बिस्तर के सिरहाने रखे टेबल लैंप को ऑन किया और जेम्स बॉन्ड पर लिखी एक किताब पढ़ रही थी| उन दिनो मुझे मशहूर लोगो के बारे मे जानने का शौक चढ़ा था|


amit ki kahani khoye panne part 1


हवाओं का काफिला और कॉफी का साथ किसी तरह से मुझे किताब मे बाँधे हुए थे| मैं बहुत बोर रही थी|  करीब आधे घंटे बाद मैने हवाओं को अपने बाल सहलाते हुए महसूस किया| अब मेरी आँखे बोझिल होती जा रही थी| अपने अपनी आँखे बंद कर ली| हवाओ ने मेरे कानों मे कुछ कहा, शायद पूछा, 'क्या तुम मेरा इंतज़ार कर रही थी?' एक पल को मैं चौंक गयी और अगले ही पल मेरी आँखों के सामने भयावह दृश्य था| मेरी किताब के दो दिन पन्ने फट चुके थे, बारिश बिना पूछे घर के अंदर दस्तक दे रही थी और तेज़ी से अपना रास्ता तलाश रही थी| मैं गुस्से मे उठी, खिड़की को बंद किया और पानी को रोकने का प्रयास करने लगी |आज पहली बार मुझे पानी से इतनी चिढ़ हुई थी उसने मेरे प्यार का जो हाल किया था उसके लिए मैं उसे ज़िंदगी भर माफ़ नही करती तभी मुझे याद आया सारी ग़लती तो उसकी है|

कहानी 'खोये पन्ने' जारी है...
आपकी राय का इंतज़ार रहेगा|

अमित की कलम से 
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थोडा लेट हूँ, लेकिन लिखने का कोई सही वक़्त नहीं होता है| पिछले दिनों 8 मार्च को अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया |  सैकड़ों कार्यक्रम हुए, कुछ एक महिलाएं सम्मानित भी हुयी | कुछ ने अपने मुश्किल दौर को लोगों के बीच रखा | तमाम न्यूज़ चैनल्स महिलाओं के स्वाभिमान की गाथा सुना रही थी, अख़बार महिलाओं के तरक्की की कहानियां बुने हुए थी | मुझे भी फख्र हो रहा था! लेकिन क्यों?

amit pandey letter


माँ को रसोईघर घर में काम करते हुए देख कर या फिर बहन को अपनी खुशियों(सपना) का गला घोट मेरे लिए घर के दूसरे कामों को जल्दी खत्म करते हुए देखकर? पत्नी का 2 किमी मंडी सिर्फ इसलिए जाना की कम से कम 50 रुपये बच जायेंगे और फिर मुझे कुछ ना बताना जानकर?  या फिर दादी का अपने चश्मे का कांच इसलिए ना बदलवाना कि मुझे इस बार जन्म दिन पर महँगी घडी देने की मज़बूरी पर गौर करके?

सोमवार, मार्च 5

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sridevi
source

“जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ में होती है |”
“दुनिया एक रंग मंच है, हम एस रंग मंच के कठपुतली है”
“तुम क्या लेकर आये थे, क्या लेकर जाओगे?”
इस तरह के डायलोग हमने बहुत देखे और सुने है | कलाकार अपनी कला से फिल्मों में हमे हँसाता है, हमें रुलाता है हाँ कभी कभी कुछ सन्देश दे जाता है | लेकिन उनकी असल जिंदगी से हमें कोई सरोकार नहीं होता है |
बीते दिनों में मीडिया और टेक्नोलॉजी ने उनकी व्यक्तिगत जिंदगी को भी तार तार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है| चाहे वो किसी अभिनेत्री को हुआ जुकाम हो या फिर चाय पर दोस्तों के संग बैठे हों|
हद तो तब हो गयी जब बेहतरीन कलाकारों में शुमार “श्री देवी” की मौत के बाद मीडिया द्वारा तमाम तरह के दलीलें देना| हो ना हो मीडिया ने उनकी दिवंगत आत्मा को भी झकझोर दिया होगा | आश्चर्य होता है, कि टीआरपी की रेस में तमाम मीडिया मानवता का खून कर रही है| इस कृत्य से ना केवल शोकाकुल परिवार आहत हुआ बल्कि हर वो शख्स जो “श्री देवी” को चाहता था, अपने आंसू पोछते हुए मीडिया की बेहूदगी पर गुस्सा जाहिर कर रहा था | अंततः बोनी कपूर को एक ख़त लिखना ही पड़ा|





हालाँकि उन्होंने खुले शब्दों में मीडिया को कुछ नहीं कहाँ क्योकि जब कोई बेशर्म हो जाये तो अपनी इज्जत खुद ही बचा लेनी चाहिए लेकिन एक इशारा जरुर किया |
“श्री देवी” बेशक बहुत ही खास थी, मैंने बचपन से उनकी बहुत सारी फ़िल्में देखी हैं, “नागिन”, “जुदाई”, "मि इंडिया", "रूप की रानी चोरों का राजा" और भी बहुत फ़िल्में मुझे अच्छी लगी| लेकिन उनकी मौत कुछ सवाल भी छोड़ गयी


क्या मीडिया यूँ ही किसी की इज्जत तार तार करता रहेगा?क्या पद्म श्री विजेताओ को गौरवमयी सम्मान (तिरंगा) देना उचित है ?क्या राज्य सरकार किसी को भी राजकीय सम्मान दे सकती है?



हम सभी श्रीदेवी को बेंतेहा प्यार करते थे लेकिन तिरंगा में लिपटे देख दुःख हुआ | उन हजारों सैनिको की तरफ से बस एक दरख्वास्त है, कम से कम तिरंगे को राजनीती के लिए इस्तेमाल मत कीजिये |
श्री देवी एक बेहतरीन अदाकारा थी लेकिन उनकी अदाकारी उनका पेशा था |
इस पोस्ट से किसी की भावना आहत हुयी हो तो माफ़ी चाहता हूँ, श्रीदेवी के परिवार के प्रति मेरी पूरी संवेदनाएं है |
जय हिंद

गुरुवार, फ़रवरी 22

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हेल्लो! ये मुलाक़ात एक छोटी सी कहानी का आखिरी भाग "मुकम्मल" है, इससे पहले की कहानी आप यह पढ़ सकते हैं- 



अभी तक आपने आपने प्रथम का एक तरफा प्यार और अन्तिमा की खुशनुमा ज़िन्दगी देखी, एक दिन प्रथम अन्तिमा का पीछा करते हुए पकड़ा जाता है, आइये जानते है प्रथम और अन्तिमा के बीच आगे क्या हुआ....


 जाने कितने किस्से सुने थे  इश्क़ के अफसानों के, उसमे हद से गुजर जाने वाले हमराही के। लेकिन आज जो हुआ वो क्या था? आवारापन ही था ना? किसी अनजान लड़की का पीछा करना, वो भी लंबे समय से । उसकी आदतें, अकेली सड़कों पर खुद से बातें सुनने का अधिकार मुझे किसने दिया था? मेरा अंतर्मन धिक्कार रहा रहा था। 
मै अंतिमा के सामने नजरें भी नहीं उठा पा रहा था। आवाज़ अभी भी आ रही थी, चारों ओर से अपमान और तिरस्कार।
Mulaqat a short story by Amit Pandey

"आप लोग जाइए, मुझे इससे कुछ बात करनी है" उसने कहा। मै चौंक गया, सभी भौचक्का थे।
"लेकिन ये आवारा लड़का है, पुलिस आ रही है।"
"चार डंडे लगाएगी तो ठीक हो जाएगा।"
"नहीं तो फिर किसी को छेड़ेगा।"
भीड़ मरवाने पर तुली थी। 
"नहीं आप लोग जाइए मै इसे समझा दूंगी, आप लोग जाइए। उसने शालीनता से कहा।
मै हतप्रभ था, आखिर  हो क्या रहा है? डर भी लग रहा था। 
धीरे धीरे भीड़ छट गई मैंने चोरी से इधर उधर आंखे घुमाई कोई नहीं था बस सामने उसके होने का आभास था। 
'सॉरी!' मैंने धीरे से कहा और उसके जवाब का इंतजार करने लगा। 

"अच्छा मज़ाक है! पहले तंग करो फिर सॉरी बोल दो। वाह यही कल्चर है ना?" उसने झुंझलाते हुए कहा। उसकी आवाज़ में दर्द साफ झलक रहा था। 

मैंने नजरें उठाई , उसकी आंखें नम थी। 
"सॉरी अन्तिमा! प्लीज़ माफ कर दो, कभी तंग नहीं करूंगा। शिव जी की कसम!" मैंने एक सांस में बोल दिया। 
"क्या बोला तुमने!" उसने सुबकते हुए पूछा।
"कभी तंग नहीं करूंगा!" मैंने फिर से बोला।
"नहीं मेरा नाम कैसे जानते हो?" उसने आसुओं में भीगा रुमाल हाथ मे पकड़ा हुआ था। 
"सच सच बताऊं?" मैंने थोड़ा हिचकिचाते हुए पूछा।
तभी बगल से चाय वाला गुजरा, "ब्लैक टी मैडम ब्लैक टी!"
'हां' और पर्स से पैसे निकालने लगी। 
"मुझे भी चाहिए चाय, रुको मै पे कर देता हूं।' मैंने थोड़ा स्मार्ट बनने की कोशिश की।

उसने पर्स बंद किया, घूरने लगी। उसकी आंखे जो भीगने से थोड़ी सूज गई थी, और ज्यादा क्यूट लग रही थी। 
"अभी पीटने से बचे हो, लेकिन कॉन्फिडेंस देखो!" वो थोड़ा मुस्काई।

और फिर मेरी जान में जान आई। 
"मै बहुत शर्मिंदा हूं, माफ कर दो प्लीज!" मैंने नजरें झुका ली।
"ठीक है!" उसने कहा।
मुझे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि उसने इतनी आसानी से माफ कर दिया। 

चाय ठंडी हो रही थी लेकिन उसकी उदारता देखकर खुद में शर्मिंदगी का बोझ बढ़ रहा था। तभी उसने एक खाली पड़ी कुर्सी की ओर इशारा किया और हम वहां से गंगा की अविरल धारा देख रहे थे, बीच बीच मैं कनखियों से  देख लेता। चाय की चुस्की और उसकी मासूमियत अद्भुत संगम था।

"नाम क्या है आपका?" उसने खामोशी तोड़ते हुए पूछा। वो अब भी दूर कहीं कुछ ढूंढ़ रही थी। 
"प्रथम" मैंने उसकी ओर देखते हुए जवाब दिया। 
उसने गहरी सांस ली। "मेरा नाम कहा से पता किया? कॉलेज?"
उसने मेरी तरफ सवालिया निगाहों से देखा।
'सोशल मीडिया' मैंने शांति से जवाब दिया
'स्टॉकर?' 
"नहीं! लंबी कहानी है।" 
और मैंने सारी बातें बता दी। 45 मिनट में सफर रुक सा गया था। सारी बातें, चांद से शिकायतें और चुस्कियों में मीठी यादें सब कुछ।

"शायद आपको लगे कि मै साईको हूं! मेरा तरीका गलत था लेकिन इरादा कभी गलत नहीं था। मुझे मेरी गलती का एहसास है और अब मै आपका पीछा नहीं करूंगा। बस मुझसे नफरत मत करना।" मैंने सब कुछ कह दिया।
आंखें थोड़ी नम थी, खो देने के डर से, पछतावे के बोध से या फिर उसकी मासूमियत भरी उदारता की वजह से मुझे नहीं पता था। 

उसने अपना रुमाल दिया।
"अच्छा ठीक है, अब पीछा मत करना। जब मिलना होगा कॉल कर लेना।" उसने हाथ आगे बढाया दोस्ती का। एक पवित्र पावन रिश्ते का। मेरी आंखे छलक उठी । 

"अब लड़कियों कि तरह रोना बंद करो, मुझे भूख लगी है, गोलगप्पे खाते हैं वहीं से" उसने मुस्कराते हुए कहा।
हम निकल पड़े, चाय की चुस्की, दादी की फूल माला और फिर गोलगप्पे की दुकान । हालांकि सभी मुझे जान गए थे लेकिन साथ देखकर थोड़ा सरप्राइज तो होंगे ही। 

मै घर गया, अपनी पॉकेट से वो रुमाल निकाला और "उनकी इनायते" बॉक्स में पहले दिन गिरा पेन, एक रोज़ उड़ा डायरी पन्ना, उनकी खींची हुई हर तस्वीर जो सोशल मीडिया पर मेरे लिए विजिबल थीवो सूखा पत्ता और भी अनगिनत चीजों के साथ रुमाल भी संजो कर रख दिया और हाँ उस रात से चांद से शिकायते भी नहीं थी | अभी भी फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेजी है, जो पहले की फोटोज थी वही सेव है | मुलाकातें अब और ज्यादा होती है, अभी भी बहुत कुछ जानना चाहता हूँ, आज कल कुछ ज्यादा खुश रहती है | अच्छा लगता है |

बस"मुलाक़ात एक छोटी सी कहानी" का सफ़र कैसा लगा! मुझे बताइए फेसबुक पर जुड़िये | आपके सुझाव का स्वागत है |


Mulaqat a short story last part by Amit Pandey 

सोमवार, फ़रवरी 19

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मुलाक़ात एक छोटी सी कहानी 

 "क्या से क्या हो गया!"

भाग 1 और भाग 2  में आपने प्रथम का एक तरफा प्यार और अन्तिमा की खुशनुमा ज़िन्दगी देखी आइये जानते है प्रथम और अन्तिमा के बीच आगे क्या हुआ....


मै मंत्रमुग्ध हो उसे ही निहार रहा था, लम्हा जैसे कुछ पल को ठहर गया हो। उसके होठ लगातार हिल रहे थे, एकाएक उसके चेहरे के भाव बदले, उसने हाथ उठाकर अभिवादन किया, प्रतिउत्तर में मैंने भी वही किया। लेकिन इस बार मुझे आवाज़ सुनाई दी।

"एक्सक्यूज मी" अंतिमा को पहली बार सुना था मैंने।

मुलाक़ात अमित पाण्डेय की कहानी

मैंने मुस्करा कर जवाब दिया ' जी, कहिए!' वो कौन बेवकूफ होगा जो हिन्दी में इतनी खूबसूरत लड़की के सामने जवाब देगा? बनारस के रिक्शे वाले भी टूटी फूटी अंग्रेजी मे बात कर लेते हैं और मै कमबख्त!
उसने संकेतों से 'जाने का रास्ता' को कहा। शायद झुंझलाहट में । अब गुस्सा आना तो लाजमी है। जान ना पहचान और मै बेमतलब का स्माइल पास कर रहा था।

'ओह सॉरी!' मैंने अपनी पहली गलती को सुधारने की कोशिश की। वो आगे बढ़ गई और मै उसे देखता रहा। मै अभी भी मुस्करा रहा था।

 एक बार फिर वो चली गई, लेकिन सुकून तो था कि

"कुछ पल ही सही दीदार तो हुआ, 

 वो मोहब्बत ही क्या जिसमें ये हाल ना हुआ।"

हालांकि मैंने उसका पीछा किया, घाट पर, नुक्कड़ की  गोलगप्पे की दुकान पर, बुढ़िया दादी के फूल माला के पास, चाय की चुस्की लेते वक्त। उसे समझना थोड़ा मुश्किल था। अकेले ही बनारस की गलियां घूम रही थी। इससे ये  जाहिर था कि बनारस से उन्हें भी उतना ही प्यार था जितना कि आम बनारसी को है।

मैं अब सोशल मीडिया से उनका पता लेता और फिर पहुंच जाता, दीदार करने, छुप छुप के ही सही देख तो लेता था।

मुझे पता था ये गलत है फिर भी उसे देखने की ललक मे खींचा चला जाता था।

 ना जाने कितनी रातें चांद से बतियाने में और उनके चर्चे करने में गुजर गए। मै तो इतने से  खुश था। हां इतने दिन में उसकी आदतें जरूर जान गया था। कितनी खुश रहती है,  और  एक खास बात थी अकेले ही । कोई तो वजह होगी. शायद! हंसती थी तो भी आंखो में कुछ खलिश तो थी।

हां मैंने अभी तक उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेजी थी। थोड़ा अटिट्यूड तो था ही ।

 एक दिन मै निकलते निकलते देर हो गया, मै बड़बड़ाते हुए घाट पर पहुंचा। तभी मै किसी से टकराया। मै वहीं गिर गया गिरने का दूसरा अनुभव था।

मै उठा, कुछ लोग मुझे घेरे हुए थे और कुछ लोग उसे उठा रहे थे। वो एक लड़की थी| मई बहुत शर्मिंदा हो गया था | जल्दीबाज़ी में ये कौन सी आफत में फस गया था | लड़का टकराया होता तो सॉरी से काम चल सकता था लेकिन अब तो कुछ ज्यादा ही भीड़ हो गयी थी |

'मोबाइल में  घुसे रहते हैं, देख कर नहीं चलते बदतमीज लोग ' किसी महिला ने कहा।

मै उस लड़की को देखने की कोशिश कर रहा था, "अंतिमा!" अनानायास ही मेरे मुंह से उसका नाम निकल पड़ा।

वो भी चौंक पड़ी थी, आश्चर्य से घूर रही थी, शायद पहचानने की कोशिश कर रही थी। मै सकपका गया था। मै डर भी रहा था, उसका टूटा चश्मा, बिखरे बाल कुछ अनहोनी की आशंका जता रहे था। वो मेरे सामने आयी, "तुम वहीं हो ना हो पिछले कुछ महीने से मेरा पीछा कर रहे हो?"

मै चौंक गया। इतने  में किसी ने कोलर पकड़ लिया था।

'पीछा करता है लड़कियों का! रुक पुलिस को फोन करते हैं।'
मै बेबस आंखो से अंतिमा को देख रहा था। वो गुस्से में भी थी।

ये  तो होना ही था, आज नहीं तो कल! लेकिन। अब आगे क्या होगा?  बने रहिये आखिरी भाग के लिये..

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"इन्तेहा हो गयी इंतजार की"


वाह! आज अरसे बाद दीदार हुआ | मैंने सूर्यदेव को नमन किया। वाकई सुबह ए बनारस की बात ही निराली है! प्रकृति का सौन्दर्य इतना मनोहर की इन्सान मंत्रमुग्ध हो जाये बशर्ते उनका मन एकाग्र हो| लेकिन मेरा मन तो कही और ही था, हाँ वही चश्मे वाली कन्या के पास | इस इन्टरनेट की भागती दुनिया में भी मै उसे 72 घंटे में नहीं ढूंढ पाया था | फिर अचानक से मेरे दिमाग में मंदिर जाने की बात आयी, हाँ वहीं जहाँ से सब छूट गया था | मैं फटाफट तैयार  हुआ और जैसे ही घर के बाहर पहुचा तो पीछे  से आवाज़ आयी ‘देख आज के दिन पिट के मत आना!’ माँ की आवाज आयी | ये माँ की चेतावनी थी, वो याद दिला रही थी की वैलेंटाइन डे है |

amit pandey

‘लो भाई हो गया अब तो...’ मैंने मन ही मन कहा।

'मंदिर जा रहा हूं' मैंने जवाब दिया। अप्रत्याशित जवाब होगा किसी भी मां के लिए। शायद वो ना सोच ले की कहीं शादी तो नहीं करके आएगा। खैर मै निकल पड़ा, प्रेम के महापर्व पर शहर बनारस की खाक छानने | आज तो शहर आशिकी से पटा था।

"कौन कहता है यहां नफरत ए आम है
इधर देखो इश्क़ की बयार है हर तरफ।"

सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक घाट, मंदिर और गलियों की धूल फ़ाकने के बाद भी नतीजा सिफर रहा।

 "ये इंतजार का सफर बड़ा बेचैन करता है,
तड़पन में कभी आंखे जार जार करता है।"

मै थका हारा और बेचारा अब बेकारा हो चुका था। एक सप्ताह बीत चुका था, मै अपनी दिनचर्या में व्यस्त हो गया था लेकिन  "उस" ओर एक चक्कर जरूर लगाता था। रातें करवटों में या फिर चांद से बतियाने में या यूं कहें कि उलाहना देने में गुजर जाता था। एक दिन सोशल मीडिया पर टाइम पास करते करते मेरा ध्यान चेक इन के विकल्प पर गया, तमाम लोग अपनी लोकेशन शेयर किए थे, मैंने भी उस दिन की चेक इन हिस्ट्री चेक करना शुरू कर दिया। मेरा चेहरा चमक रहा था, खुशी के मारे या फिर एक बार फिर  उसे देख पाने की आस में! ये नहीं पता था। पूरा चेक इन देखने के बाद भी वो कहीं नहीं मिली। मै उदास हो गया था|

 ये वाकई चौंका देने वाला था कि लड़कियां हर छोटी छोटी चीज़े भी साझा करती है, इस लड़की का कोई जिक्र ही नहीं था। मै बेमन से तस्वीरें देख रहा था, की मेरी नजर एक तस्वीर पर थम गयी।

 नौका विहार की बहुत ही सुन्दर फोटो, सूर्यास्त के समय की। मैंने उत्सुकतावश उसकी प्रोफ़ाइल खोली। 'अन्तिमा शर्मा' मुझे अनंत मिल चुका था, "प्रथम" के जीवन की अनुभूति । मेरे आंखों से मेरा प्रेम उछल रहा था, आज नयन नीर अनजाने में ही अविरल प्रवाह से बह रहे थे।

'अंतिमा' मैंने हजारों बार  नाम दोहराया होगा, उसकी चंद तस्वीरें जो अब भी मेरे सामने थी मुझे अलौकिक सुख दे रही थी।

उसकी प्रोफ़ाइल से ही पता चला कि आज वो घाट पर जा रही है।  मेरे लिए ये मौका था एक बार फिर  देखने का और बिना समय गवाएं और बिना सोचे मै पहुंच गया।

एक घंटे का इंतज़ार, जैसे सदियाँ लग गयी हो लेकिन जब  'अन्तिमा' की झलक मिली, तो जन्नत का एहसास हुआ |  वहीं मासूमियत काली बिंदी, कैट आई चश्मा, पिंक लिपस्टिक और एक बार फिर से प्यार हो गया था और हां मैंने गौर किया था की सफेद टीशर्ट और ब्लू जीन्स में थी। कुछ पल बाद ही ऐसा लग रहा था कि वो मेरे करीब आ रही थी, बिल्कुल करीब और कुछ देर बाद मेरे सामने, ठीक सामने । आई टू आई... कहीं ये सपना तो नहीं? मैंने अपना चश्मा उतारा | वो बिलकुल सामने ही थी | मैं  मंत्रमुग्ध हो उसे ही देख रहा था | उसके होंठ चल रहे थे शायद कुछ कह रही थी लेकिन मैं तो उसी में खोया, सब कुछ भूल चूका था |

  नाम तो पता चल गया होगा, और इनकी फेस टू फेस मुलाक़ात भी हो गई। तो आगे क्या होगा? क्या आगे भी बात बढ़ेगी? सब कुछ पता चलेगा थोड़ा सब्र रखिए और हां पसंद आए तो कॉमेंट करे और बहुत ज्यादा पसंद आए तो शेयर भी कर दें|
मिलते है फिर...

शनिवार, फ़रवरी 17

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पहले ये बता दूँ ये फिल्मी नहीं है तो इत्तेफाक वाली चीज़ नहीं होनी है और जरुरी बात ये प्यार वाली कहानी है तो जज्बातों की क़द्र कीजियेगा |

पसंद आये तो कमेंट और दिल को छू जाये तो शेयर भी कर देना |

पहली दफा

Mulaqat By Amit Pandey part one pahali dafa
पहली दफा
शुरू करते हैं
यूँ तो सभी वैलेंटाइन मनाने में मशगूल थे, तो हम बेचारे सिंगल लोग इसके गुजरने का इंतज़ार कर रहे थे | कसम से ये 10 दिन बहुत ही ज्यादा टॉर्चर करते हैं और ऊपर से ऑटो, घाट, रेस्टोरेंट में पैर रखने की जगह ढूढना भी मुश्किल! तो मैं निकल पड़ा, अकेले ही मंदिर की ओर| अरे गलत मत समझिये मै तो बस शांति की तलाश में निकला था, दशाश्वमेध घाट की ओर, उस दिन कुछ ज्यादा ही चहल पहल थी और बैरीकेड भी लगे थे जाहिर है, शिवरात्री की तैयारी जोरों पर थी|   

फिर भी आगे बढ़ रहा था, तभी मेरी नज़र एक लड़की से मिली हां भाई ! वो दूकानदार से बिल मांग रही थी शायद! इतनी मासूमियत, कैट आई चश्मा ब्लैक फ्रेम में, और माथे पर बिंदी खूबसूरती में चार चाँद लगा रही थी | बस इतना ही याद रहा मुझे!
कि अचानक से किसी ने मुझे धक्का दिया और मै नीचे गिर गया था और मेरी नज़रे क्या हटी वो तो गायब ही हो गयी | कसम से जिसने भी धक्का दिया वो किसी ज़माने में क्रूर ही रहा होगा, मैं उसे ढूंढने के लिए भागा| कम से कम बात ना सही देख तो लूँगा लेकिन अब कहाँ मिलेगी? जो कहते है की ढूढने से भगवान भी मिल जायेंगे, मेरे सामने आयें तो बताऊ |

                                        “किसकी तलाश में था तू  कब से    
भूल आया है आज तू अपना थैला उसके दर पे"

खैर अब मेरी बत्ती गुल हो गयी थी, क्या करें भोले बाबा ने एक ही चीज़ दी थी! मनमौजी, आज वो भी चली गयी | उस रोज़ पहली बार पंखे पर लगी धूल, मिटटी दिखाई दी थी| जब नीद नहीं आ रही थी तो बेहतर था थोडा ठंडी हवा ले लूँ | रात के दो बजे मैं छत पर गया, चांदनी रात, और आश्चर्य हो रहा था की आसमाँ इतना जगमगा क्यू रहा था? अद्भुत इतनी खुबसूरत रात ! दूर दूर तक ये नज़ारा और असीम शांति | मैंने चाँद की एक झलक ली और फिर यूँ खोया की सूरज की पहली किरण के साथ आँख खुली |   

अब बताओ ये जो पहली बार हुआ है, उन्हें ढूंढेगा कैसे ? क्या कोई इत्तेफाक़ होगा? हालाँकि इत्तेफाक़ जैसी चींजे फिल्मों में ज्यादा होती है तो आगे क्या होगा?
जल्द ही पोस्ट करता हूँ, अमित पाण्डेय की लिखी कहानी है जारी रहेगी ...
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सृष्टि ठाकुर , एक नाम अंग्रेजी से एम.ए. कर रही छात्रा का ...... जिनकी कविताओं में आपको अलग ही मिजाज , अलग ही झलक मिलती है।

सृष्टि ने बताया की वो कवितायें सिर्फ मन की बेचैनी को मन के बाहर लाने के लिए लिखती हैं हाँ मगर उनमे ये काबिलियत है की उनकी कवितायें युवाओं के मन रुपी वीणा के तारों को छेड़कर एक नई धुन को जन्म देतीं है।
अब बात करें उनकी आज की कविता "डेट योरसेल्फ" की तो उसमें कितनी खूबसूरती के साथ उन्होंने बताया है की अगर आपके साथ कोई डेट पर जाने को नहीं है तो आप स्वयं के साथ डेट पर जाइये , कुछ ख़ास समय खुद के लिए निकालिये और स्वयं से प्रेम कर के देखिये।

सुमित -: गुड इवनिंग , मैं सुमित , क्रिएटिव कलर्स से
सृष्टि -:  गुड इवनिंग , मैं सृष्टि ठाकुर हूँ।

सुमित -: सृष्टि ठाकुर , wow  नाम तो बहुत अच्छा है आपका
सृष्टि -: जी , शुक्रिया |

सुमित -: आप अपने बारे में कुछ बतायेंगी ?

सृष्टि -: जी , मैं अभी अंग्रेजी से परास्नातक कर रही हूँ ।

सुमित -: ओह हो , तो यही है आपकी अंग्रेजी में लिखी हुई कविताओं का राज ...!!!!

वैसे आपके लेखन की शुरुआत कब हुई ?


सृष्टि -: जी मैं कब और क्यों लिखना शुरू किया इस बारे में तो मुझे याद नहीं है पर हाँ मेरे लिखने का कोई निश्चित समय नहीं होता है जब मेरे मन में भावों का अतिरेक होने लगता है तो मैं उन्हें कागज़ पर उतार देती हूँ और एक नई कविता अवतरित हो जाती है।

सुमित -: अच्छा आप अपनी आज की कविता "डेट योरसेल्फ" के बारे में क्या कहना चाहेंगी ?

सृष्टि -: ये कविता मैंने उन लोगों के लिए लिखी थी जिनके पास डेट करने के लिए कोई पार्टनर नहीं है , इस कविता में मैंने ये बताने की कोशिश की है की किसी अच्छे पार्टनर को डेट के लिए इन्तजार करने की बजाय हमें स्वयं के लिए भी थोडा समय निकालना चाहिए ताकि हम स्वयं को और भली भाँति से जान सकें और अपने मन की इच्छाओं की भी पूर्ति कर सकें।

सुमित -: चलिए , बहुत - बहुत शुक्रिया , हम अगली बार आपसे एक नई और खूबसूरत कविता सुनने के इन्तजार में विदा लेते हैं।

सृष्टि -: जी , शुक्रिया , अलविदा।

धन्यवाद।

सुमित सोनी के साथ युवा साहित्यकारों से बात चित का सिलसिला जारी है